Best Shayari of Jigar Moradabadi

Best Shayari of Jigar Moradabadi Shayari
आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है
भूल जाता हूँ मैं सितम उस के वो कुछ इस सादगी से मिलता है
आज क्या बात है के फूलों का रंग तेरी हँसी से मिलता है
मिल के भी जो कभी नहीं मिलता टूट कर दिल उसी से मिलता है
कारोबार -ए-जहाँ सँवरते हैं होश जब बेख़ुदी से मिलता है
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मुमकिन  नहीं कि जज़्बा-ए-दिल कारगर  न हो
ये और बात है तुम्हें अब तक ख़बर न हो
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सोज़ में भी वही इक नग़्मा है जो साज़ में है
फ़र्क़ नज़दीक़ की और दूर की आवाज़ में है
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लाखों में इंतिख़ाब के क़ाबिल बना दिया
जिस दिल को तुमने देख लिया दिल बना दिया
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निगाहों से छुप कर कहाँ जाइएगा जहाँ जाइएगा, हमें पाइएगा
मिटा कर हमें आप पछताइएगा कमी कोई महसूस फ़र्माइएगा
हीं खेल नासेह ! जुनूँ की हक़ीक़त समझ लीजिए तो समझाइएगा
कहीं चुप रही है ज़बाने-महब्बत न फ़र्माइएगा तो फ़र्माइएगा
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अब तो यह भी नहीं रहा अहसास दर्द होता है या नहीं होता
इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता
हाय क्या हो गया तबीयत को ग़म भी राहत-फ़ज़ा नहीं होता
वो हमारे क़रीब होते हैं जब हमारा पता नहीं होता
दिल को क्या-क्या सुकून होता है जब कोई आसरा नहीं होता
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पाँव उठ सकते नहीं मंज़िले -जानाँ के ख़िलाफ़
और अगर होश की पूछो तो मुझे होश नहीं
हुस्न से इश्क़ जुदा है न जुदा इश्क़ से हुस्न
कौन-सी शै है जो आग़ोश-दर-आग़ोश नहीं
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दर्द बढ़ कर फुगाँ ना हो जाये ये ज़मीं  आसमाँ ना हो जाये
दिल में डूबा हुआ जो नश्तर  है मेरे दिल की ज़ुबाँ  ना हो जाये
दिल को ले लीजिए जो लेना हो फिर ये सौदा गराँ  ना हो जाये
आह कीजिए मगर लतीफ़-तरीन लब तक आकर धुआँ  ना हो जाये
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हर सू दिखाई देते हैं वो जलवागर मुझे क्या-क्या फरेब देती है मेरी नज़र  मुझे
डाला है बेखुदी ने अजब राह पर मुझे आँखें हैं और कुछ नहीं आता नज़र मुझे
दिल ले के मेरा देते हो दाग़-ए-जिगर मुझे ये बात भूलने की नहीं उम्र भर मुझे
आया ना रास नाला-ए-दिल का असर मुझे अब तुम मिले तो कुछ नहीं अपनी ख़बर  मुझे
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इश्क़ की दास्तान है प्यारे  अपनी-अपनी ज़ुबान है प्यारे 
हम ज़माने से इंतक़ाम तो लें  एक हसीं दर्मियान है प्यारे 
तू नहीं मैं हूं मैं नहीं तू है  अब कुछ ऐसा गुमान है प्यारे 
रख क़दम फूँक-फूँक कर नादान  ज़र्रे-ज़र्रे में जान है प्यारे
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इश्क़ फ़ना  का नाम है इश्क़ में ज़िन्दगी न देख  जल्वा-ए-आफ़्ताब  बन ज़र्रे में रोशनी न देख 
शौक़ को रहनुमा बना जो हो चुका कभी न देख  आग दबी हुई निकाल आग बुझी हुई न देख 
तुझको ख़ुदा का वास्ता तू मेरी ज़िन्दगी न देख  जिसकी सहर भी शाम हो उसकी सियाह शबी  न देख
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इस इश्क़ के हाथों से हर-गिज़ नामाफ़र देखा  उतनी ही बड़ी हसरत जितना ही उधर देखा 
था बाइस-ए-रुसवाई हर चंद जुनूँ मेरा  उनको भी न चैन आया जब तक न इधर देखा 
यूँ ही दिल के तड़पने का कुछ तो है सबब आख़िर  याँ दर्द ने करवट ली है याँ तुमने इधर देखा 
माथे पे पसीना क्यों आँखों में नमी सी क्यों  कुछ ख़ैर तो है तुमने क्या हाल-ए-जिगर देखा
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साक़ी पर इल्ज़ाम न आये  चाहे तुझ तक जाम न आये 
तेरे सिवा जो की हो मुहब्बत  मेरी जवानी काम न आये 
जिन के लिये मर भी गये हम वो चल कर दो गाम न आये 
इश्क़ का सौदा इतना गराँ है  इन्हें हम से काम न आये 
मयख़ाने में सब ही तो आये  लेकिन “ज़िगर” का नाम न आये
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मुद्दत में वो फिर ताज़ा मुलाक़ात का आलम 
ख़ामोश अदाओं में वो जज़्बात का आलम 
अल्लाह रे वो शिद्दत-ए-जज़्बात का आलम 
कुछ कह के वो भूली हुई हर बात का आलम 
आरिज़ से ढलकते हुए शबनम के वो क़तरे 
आँखों से झलकता हुआ बरसात का आलम 
वो नज़रों ही नज़रों में सवालात की दुनिया 
वो आँखों ही आँखों में जवाबात का आलम
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कहाँ वो शोख़, मुलाक़ात ख़ुद से भी न हुई 
बस एक बार हुई और फिर कभी न हुई 
ठहर ठहर दिल-ए-बेताब प्यार तो कर लूँ 
अब इस के बाद मुलाक़ात फिर हुई न हुई 
वो कुछ सही न सही फिर भी ज़ाहिद-ए-नादाँ 
बड़े-बड़ों से मोहब्बत में काफ़िरी न हुई 
इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी 
कि हम ने आह तो की उन से आह भी न हुई
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इश्क़ को बे-नक़ाब होना था  आप अपना जवाब होना था 
तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं  हाँ मुझी को ख़राब होना था 
दिल कि जिस पर हैं नक़्श-ए-रंगारंग  उस को सादा किताब होना था 
हमने नाकामियों को ढूँढ लिया  आख़िर इश्क कामयाब होना था
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ज़र्रों से बातें करते हैं दीवारोदर से हम।
मायूस किस क़दर है, तेरी रहगुज़र से हम॥
कोई हसीं हसीं ही ठहरता नहीं ‘जिगर’।
बाज़ आये इस बुलन्दिये-ज़ौक़े-नज़र से हम॥
इतनी-सी बात पर है बस इक जंगेज़रगरी।
पहले उधर से बढ़ते हैं वो या इधर से हम॥
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आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त! घबराता हूँ मैं।
जैसे हर शै में किसी शै की कमी पाता हूँ मैं॥
कू-ए-जानाँ की हवा तक से भी थर्राता हूँ मैं।
क्या करूँ बेअख़्तयाराना चला जाता हूँ मैं॥
मेरी हस्ती शौक़-ए-पैहम, मेरी फ़ितरत इज़्तराब।
कोई मंज़िल हो मगर गुज़रा चला जाता हूँ मैं॥
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दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उनको सुनाई न गई 
बात बिगड़ी थी कुछ ऐसी कि बनाई न गई 
सब को हम भूल गए जोश-ए-जुनूँ में लेकिन 
इक तेरी याद थी ऐसी कि भुलाई न गई 
इश्क़ पर कुछ न चला दीदा-ए-तर का जादू 
उसने जो आग लगा दी वो बुझाई न गई 
क्या उठायेगी सबा ख़ाक मेरी उस दर से 
ये क़यामत तो ख़ुद उन से भी उठाई न गई
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ओस पदे बहार पर आग लगे कनार में 
तुम जो नहीं कनार में लुत्फ़ ही क्या बहार में 
उस पे करे ख़ुदा रहम गर्दिश-ए-रोज़गार में 
अपनी तलाश छोड़कर जो है तलाश-ए-यार में 
हम कहीं जानेवाले हैं दामन-ए-इश्क़ छोड़कर 
ज़ीस्त तेरे हुज़ूर में, मौत तेरे दयार में
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फ़ुर्सत कहाँ कि छेड़ करें आसमाँ से हम
लिपटे पड़े हैं लज़्ज़ते-दर्दे-निहाँ से हम
इस दर्ज़ा बेक़रार थे दर्दे-निहाँ से हम 
कुछ दूर आगे बढ़ गए उम्रे-रवाँ से हम
ऐ चारासाज़ हालते दर्दे-निहाँ न पूछ
इक राज़ है जो कह नहीं सकते ज़बाँ से हम
बैठे ही बैठे आ गया क्या जाने क्या ख़याल 
पहरों लिपट के रोए दिले-नातवाँ  से हम
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मर के भी कब तक निगाहे-शौक़ को रुस्वा करें
ज़िन्दगी तुझको कहाँ फेंक आएँ आख़िर क्या करें
ज़ख़्मे-दिल मुम्किन नहीं तो चश्मे-दिल ही वा करें
वो हमें देखें न देखें हम उन्हें देखा करें


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