Sangdil (संगदिल)


Shayri zone


wo sangdil mere saache me dhal nahi paya
thoda sa naram hua tha pighal nahi paya...

na jane kya tha pita ki udaas aankho me

khilona dekh kar bacha machal nahi paya..


tamaam rojno-dar band kar ke dekh liye

diya hawao ki zulf se nikal nahi paya...


wo sangdil mere saache me dhal nahi paya

thoda sa naram hua tha pighal nahi paya..


aur teri judai ne phattar bna diya hai muje

mai aaj tak kisi saache me dhal nahi paya...


ye dar hai mujko usko ab pta na chal jaye

mai apne aap ko ab tak badal nahi  paya...


wo sangdil mere saache me dhal nahi paya

thoda sa naram hua tha pighal nahi paya...


har ek mod pe manzil par mil he jata hai

wo humsafar jo mere sath chal nahi paya...


wo sath tha to kayi uske jaise lagte the

bichad gya to chehra uska badal nahi paya..


wo sangdil mere saache me dhal nahi paya

thoda sa naram hua tha pighal nahi paya......
❤❤❤❤


वो संगदिल में साचे में ढल नहीं पाया 
थोड़ा सा नरम हुआ था पिघल नहीं पाया.. 

ना जाने क्या था पिता की उदास आँखों में 
खिलौना देख कर बच्चा मचल नहीं पाया... 

तमाम रोजनो दर बंद करके देख लिए 
दिया हवाओ की ज़ुल्फ़ से निकल नहीं पाया 


वो संगदिल में साचे में ढल नहीं पाया 
थोड़ा सा नरम हुआ था पिघल नहीं पाया.. 

और तेरी जुदाई ने फत्थर बना दिया है मुझे 
मै आज तक किसी साचे में ढल नहीं पाया... 

ये डर है मुझको उसको अब पता न चल जाये 
मै  अपने आप को अब तक बदल नहीं पाया.. 


वो संगदिल में साचे में ढल नहीं पाया 
थोड़ा सा नरम हुआ था पिघल नहीं पाया.. 


हर एक मोड़ पे मंज़िल पर मिल हे जाता है 
वो हमसफ़र जो मेरे साथ चल नहीं पाया। 

वो साथ था तो कई उसके जैसे लगते थे 
बिछड़ गया तो चेहरा उसका बदल नहीं पाया 

वो संगदिल में साचे में ढल नहीं पाया 
थोड़ा सा नरम हुआ था पिघल नहीं पाया.. 




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